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Thursday, April 8, 2021

चमकीली खिड़की


बहुत समय पहले की बात है। शहर से दूर एक घाटी में एक छोटा सा घर  था।  उस घर में सभी हंसी ख़ुशी रहते थे। उसी घर में एक छोटी सी प्यारी बच्ची भी रहती थी। वो छोटी बच्ची दिन भर अपने छोटे से घर के आँगन में खेलती कूदती रहती थी।  घाटी के पास एक ऊँचा पहाड़ था और उस पहाड़ में ऊपर एक छोटा घर था।  उस घर की खिड़किया बहुत ही चमकीली थी जैसे किसी सोने की तरह चमक रही हो।  वो छोटी बची हमेशा अपने छोटे से घर के बगीचे से उस पहाड़ के ऊपर स्थित घर को देखा करती थी और हमेशा किसी ख्यालो में खोये रहती थी।  उसे उस घर की चमकीली खिरडिया बहुत भाती थी।  मगर उसका घर तो छोटा और सामान्य सा था इसीलिए वो  हमेशा वहा  जाने की सोचती रहती थी।  जब वो थोड़ी बड़ी हुए तोह अपने माँ से साइकिल चलाने के बहाने घर से  बाहर जाने की इजाजत मांगी।  उसकी माँ ने कहा "देखो ज्यादा दूर नहीं जाना घर के पास ही में रहना " . फिर क्या था  वो साइकिल ली और चल दी उस पहाड़ी की चोटी में उस घर की ओर जिसकी खिड़किया सोने की तरह चमकती थी। उसके मन में तरह तरह के जिज्ञासाएं आती रही वो कितना अच्छा और सूंदर सा घर है और उसका अपना घर कितना पुराणा और सामान्य सा दिखने वाला है।  इसी सोचे में आगे बढ़ते बढ़ते वो उस घर के पास पहुंच गयी और उसके आंगन में अपनी साइकिल लगायी।  मगर उसे देख के आश्चर्य हुआ की वास्तव में उस घर की खिड़कियों की हालत और भी ख़राब थी और वो घर पूरी तरह जर्जर स्थिति में था।  ये देख उसे बड़ी निराशा हुई और फिर जैसे ही वापस अपने घर जाने के लिए मुड़ी तोह वो देखी पहाड़ी के नीचे घाटियों के पर एक छोटा सा घर है जिसकी खिड़किया बिलकुल उसी तरह चमक रही है जैसा वो उस पहाड़ी में बसे को घर को अपने घर से देखा करती थी।  ये घाटी में दिखाई देने वाला घर उसका की था।  वास्तव में ये सूर्य की किरणे थी जो घर की खिड़कियों के शीशे से टकरा कर चमकती दिखाई देती थी।  उसे एहसास हुआ की वास्तव में उसका अपना घर जो घाटी में है जहा उसने अपना बचपन गुजरा , माता पिता का प्यार मिला , जिसके आँगन में खेल वो बड़ी हुई और अभी उस घर की खिड़किया सूर्य की रोशनी के कारण चमकती दिखाई दे रही है वह घर सामान्य होने के बावजूद सबसे अच्छा घर है जहां  उसे सभी का प्यार और स्नेह मिलता रहा।  और फिर वो अपने घर की वापस चल दी और फिर कभी अपने घर को उसने सामान्य और छोटा नहीं समझा।


इस कहानी से हमें यह सिख मिलती है की हम कभी कभार हमारे पास जो है उसकी एहमियत को नहीं समझते और दूसरे की चीज़ो ज्यादा श्रेष्ठा मानने लगते है और फिर जब वो चीज़ हमारे हाथ से चली जाती है तब हमें उसकी महत्ता का एहसास होता है। 

Wednesday, April 7, 2021

रंगीन गुब्बारे



 



एक बार एक मेले में एक गुब्बारे वाला गुब्बारा बेच रहा था।  उसके पास कई विभिन्न प्रकार के विभिन्न रंगो के गुब्बारे थे।  जब कभी वो देखता की गुब्बारे की बिक्री नहीं हो रही है तो वो एक गुब्बारा आसमान में छोड़ देता और वो गुब्बारा आसमान में ऊर जाता।  इसे देख कई बच्चे खुश हो जाते और गुब्बारे खरीदने गुब्बारे वाले के पास दौड़कर आते।  उनमे से एक बचा बड़े आश्चर्य से उस आसमान में उरते हुए गुब्बारे को देखता है और पास जाकर गुब्बारे वाले से बोलता है क्या आपके पास वो काला रंग का गुब्बारा है वो भी उड़ेगा ?  गुब्बारे वाला सुनकर पहले तोह हसता  है फिर बोलता है "गुब्बारे उड़ेगा या नहीं ये इस बात पर निर्भर नहीं करता ही गुब्बारा किस रंग का है बल्कि उस गुब्बारे के अंदर क्या है। "

वास्तव में ये कहानी हमारी जीवन की सच्चाई को दिखती है। हमारी प्रतिभा इस बात पर निर्भर नहीं करती की हम ऊपर से दिखने में कैसे है बल्कि इस बात पे निर्भर करती है की हम अंदर से कैसे कितने अनुशासित है कितने मेहनती है कितने प्रयासवन है। ये अंदर में निहित गुण ही तय करते है की हमें सफलता हासिल होगी या नहीं।  

Tuesday, April 6, 2021

दो मेंढको की कहानी

 




एक बार की बात है।  एक पहाड़ी से एक मेंढको का पूरा समूह जा रहा था।  तभी अचानक उनमे से दो मेंढक पहाड़ी से गिर गए और एक गड्ढे में फस गए।  फिर दोनों ऊपर उठने के लिए पूरा जोर लगाने लगे।  ऊपर के दूसरे मेंढको ने जब ये सब होते हुए देखा तोह मदद के बजाय वो कहने लगे सबके तक़दीर में क्या लिखा है वो पहले से ही तय है और आपके तक़दीर में इस गड्ढे  में गिरना लिखा था सो आपलोग व्यर्थ प्रयास न करे आप भाग्य का लिखा नहीं बदल सकते।  दोनों मेढक ये सब सुनने के बाद में अपने उठते रहने का प्रयास जारी रखा।  वो जोर जोर से कूदते और फिर चढ़ते  फिर फिसल जाते।  बाकि के ऊपर के मेंढक हमेशा यही कहते रहते आप प्रयास छोड़ दे  आप अपने भाग्य को नहीं बदल सकते।  बार बार यही कहने के कारण दो में से एक मेंढक ने अपना प्रयास छोड़ दिया।  मगर दूसरे मेंढक ने अपना प्रयास जारी रखा और जैसे ऊपर के मेंढक जोर जोर से चिल्लाते और कहते अपना प्रयास छोड़ दे वो उतना जोर से कूदता फिर फिसलता फिर कूदता और इस तरह वो अंतिम में पहाड़ी में ऊपर अपने समूह में वापस पहुंच गया।  ऊपर पहुंचने के बाद बाकि के मेंढको ने पूछा हमने पुरे समय तुम्हे प्रयास छोड़ने  को कहा मगर तुमने क्यों नहीं हमारी बात सुनी तोह वो मेंढक बोला "मैं बहरा हु जब तुमलोग जोर जोर से कुछ कह रहे थे तोह मुझे लगा तुमलोग मुझे प्रोत्साहित कर रहे हो और मैं ऊपर आ गया। "


वास्तव में हम लोगो की कहानी भी कुछ ऐसी ही है हम जब कुछ नया करने का सोचते है तोह कई लोग हमें मना  कर देते है और उस चीज़ की कमइया गिनाने लग जाते जैसे  की  जो लोग पहले उसे किये है वो कैसे हर गए उसके किस्से सुनाने लगते और हम भी उनकी बातो को मान अपना प्रयास छोड़ देते है।  यदि हमने कुछ ठान लिया है तोह तुम्हे भी थोड़ा बहरा बनना पड़ेगा।  सुने सबकी जैसे जिन्होंने किया वो क्यों हार गए इसको जाने, मगर करे वही जो  लगे आप कर सकते है और कोई  कहे  की आप नहीं कर सकते तोह उसके लिए थोड़ा बहरा बन जाये. 

Tuesday, March 30, 2021

स्वयं पर विश्वास करो

 एक नगर में एक ब्राम्हण पंडित रहता था।  उसे एक सेठ में दक्षिणा में एक बकरा दिया था।  पंडित बकरे को पाकर बहुत खुश था और उसे लेकर अपने घर की ओर चल दिया।  रास्ते में तीन ठगो ने ब्राम्हण को बकरे के साथ आते देखा।  उनलोगो ने आपस में विचार किया क्योना इस पंडित से इसके बकरे को किसी तरह ले लिया जाये और फिर हमलोग आज खाने में इस बकरे का स्वाद लेंगे। तभी उन तीनो ठगो में से एक ने एक षड्यंत्र रचा।  उनमे से एक ने वेष बदल कर पंडित के समीप गया और बोला "अरे पंडितजी आप इस कुत्ते को लेकर कहा जा रहे है।"


"अरे मुर्ख अँधा है क्या दिखायी नहीं देता ये कुत्ता नहीं बकरा है " पंडित ने बोलै। 

और ये कहकर पंडित आगे बढ़ गए । 

कुछ दूर जाते ही दूसरा ठग पंडित के सामने आया और बोला , "अरे पंडित जी आप इस बछड़े को लेकर कहा जा रहे है "

यह सुनकर पंडित जो को और क्रोध आ गया और गुस्से में बोला "अँधा है क्या दिखाई नहीं देता ये बकरा है कोई बछड़ा नहीं "

और यह कहकर पंडित जी आगे बढ़ गए। 

कुछ और दूर जाते ही तीसरे ठग से उनका सामना गए और तीसरे ठग ने बोलै 

"अरे पंडित जी आप इस गधे को लेकर कहा  जा रहे है "

इस बार पंडित की चिंता बार गयी और वो सोचने लगे 

"बार बार लोग आकर इसे कभी कुत्ता तो कभी बछड़ा तो कभी गधा क्यों बोल रहे है "

उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।  कुछ अपसगुन होने के डर से वो पंडित भयभीत होकर उस बकरे को वही रस्ते में चोर कर भाग गया। 

फिर उन ठगो ने उस बकरे को पकड़ उसका भोजन में आनंद लिया। 



इसीलिए कहा गया है स्वयं पर विस्वास करो और हमेशा दूरसे के बातो में विस्वास न कर लिया करो. 

Wednesday, December 16, 2020

एक डरपोक चूहे की कहानी

 एक समय की बात है। एक जंगल में एक चूहा रहता था। वो हमेशा बिल्लियों से डरा सेहमा  रहता था। एक बार उसी जंगल से एक जादूगर गुजर रहा था।  उसने उस चूहे की स्थिति जान कर उसे एक बिल्ली में बदल दिया।  बिल्ली बनने के बाद कुछ दिनों तक चूहा तो खुसी खुसी रहने लगा मगर फिर उसमे चिंता की लकीरे वापस आ गयी. जादूगर ने उससे उसकी चिंता का कारन पूछा तोह उसने बताया की वो अब बाघों से बहुत डरता है।  जादूगर ने उसकी सहायता करनी चाही और उसे  अपने जादू से एक बाघ में बदल दिया।  कुछ दिनों तक सब सही चल रहा था मगर फिर वो शिकारियों से बहुत डरने लगा।  इस वक़्त तक  तो वो जादूगर भी उसके सामने हर मन चूका था और उसे वापस चूहे में ही वापस बदल दिया और बोला "तुम्हारी मैं कोई मदद नहीं कर सकता क्योकि तम्हारा दिल ही चूहे का है"

 

चमकीली खिड़की

बहुत समय पहले की बात है। शहर से दूर एक घाटी में एक छोटा सा घर  था।  उस घर में सभी हंसी ख़ुशी रहते थे। उसी घर में एक छोटी सी प्यारी बच्ची भी र...