एक बार की बात है। एक पहाड़ी से एक मेंढको का पूरा समूह जा रहा था। तभी अचानक उनमे से दो मेंढक पहाड़ी से गिर गए और एक गड्ढे में फस गए। फिर दोनों ऊपर उठने के लिए पूरा जोर लगाने लगे। ऊपर के दूसरे मेंढको ने जब ये सब होते हुए देखा तोह मदद के बजाय वो कहने लगे सबके तक़दीर में क्या लिखा है वो पहले से ही तय है और आपके तक़दीर में इस गड्ढे में गिरना लिखा था सो आपलोग व्यर्थ प्रयास न करे आप भाग्य का लिखा नहीं बदल सकते। दोनों मेढक ये सब सुनने के बाद में अपने उठते रहने का प्रयास जारी रखा। वो जोर जोर से कूदते और फिर चढ़ते फिर फिसल जाते। बाकि के ऊपर के मेंढक हमेशा यही कहते रहते आप प्रयास छोड़ दे आप अपने भाग्य को नहीं बदल सकते। बार बार यही कहने के कारण दो में से एक मेंढक ने अपना प्रयास छोड़ दिया। मगर दूसरे मेंढक ने अपना प्रयास जारी रखा और जैसे ऊपर के मेंढक जोर जोर से चिल्लाते और कहते अपना प्रयास छोड़ दे वो उतना जोर से कूदता फिर फिसलता फिर कूदता और इस तरह वो अंतिम में पहाड़ी में ऊपर अपने समूह में वापस पहुंच गया। ऊपर पहुंचने के बाद बाकि के मेंढको ने पूछा हमने पुरे समय तुम्हे प्रयास छोड़ने को कहा मगर तुमने क्यों नहीं हमारी बात सुनी तोह वो मेंढक बोला "मैं बहरा हु जब तुमलोग जोर जोर से कुछ कह रहे थे तोह मुझे लगा तुमलोग मुझे प्रोत्साहित कर रहे हो और मैं ऊपर आ गया। "
वास्तव में हम लोगो की कहानी भी कुछ ऐसी ही है हम जब कुछ नया करने का सोचते है तोह कई लोग हमें मना कर देते है और उस चीज़ की कमइया गिनाने लग जाते जैसे की जो लोग पहले उसे किये है वो कैसे हर गए उसके किस्से सुनाने लगते और हम भी उनकी बातो को मान अपना प्रयास छोड़ देते है। यदि हमने कुछ ठान लिया है तोह तुम्हे भी थोड़ा बहरा बनना पड़ेगा। सुने सबकी जैसे जिन्होंने किया वो क्यों हार गए इसको जाने, मगर करे वही जो लगे आप कर सकते है और कोई कहे की आप नहीं कर सकते तोह उसके लिए थोड़ा बहरा बन जाये.
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