बहुत समय पहले की बात है। शहर से दूर एक घाटी में एक छोटा सा घर था। उस घर में सभी हंसी ख़ुशी रहते थे। उसी घर में एक छोटी सी प्यारी बच्ची भी रहती थी। वो छोटी बच्ची दिन भर अपने छोटे से घर के आँगन में खेलती कूदती रहती थी। घाटी के पास एक ऊँचा पहाड़ था और उस पहाड़ में ऊपर एक छोटा घर था। उस घर की खिड़किया बहुत ही चमकीली थी जैसे किसी सोने की तरह चमक रही हो। वो छोटी बची हमेशा अपने छोटे से घर के बगीचे से उस पहाड़ के ऊपर स्थित घर को देखा करती थी और हमेशा किसी ख्यालो में खोये रहती थी। उसे उस घर की चमकीली खिरडिया बहुत भाती थी। मगर उसका घर तो छोटा और सामान्य सा था इसीलिए वो हमेशा वहा जाने की सोचती रहती थी। जब वो थोड़ी बड़ी हुए तोह अपने माँ से साइकिल चलाने के बहाने घर से बाहर जाने की इजाजत मांगी। उसकी माँ ने कहा "देखो ज्यादा दूर नहीं जाना घर के पास ही में रहना " . फिर क्या था वो साइकिल ली और चल दी उस पहाड़ी की चोटी में उस घर की ओर जिसकी खिड़किया सोने की तरह चमकती थी। उसके मन में तरह तरह के जिज्ञासाएं आती रही वो कितना अच्छा और सूंदर सा घर है और उसका अपना घर कितना पुराणा और सामान्य सा दिखने वाला है। इसी सोचे में आगे बढ़ते बढ़ते वो उस घर के पास पहुंच गयी और उसके आंगन में अपनी साइकिल लगायी। मगर उसे देख के आश्चर्य हुआ की वास्तव में उस घर की खिड़कियों की हालत और भी ख़राब थी और वो घर पूरी तरह जर्जर स्थिति में था। ये देख उसे बड़ी निराशा हुई और फिर जैसे ही वापस अपने घर जाने के लिए मुड़ी तोह वो देखी पहाड़ी के नीचे घाटियों के पर एक छोटा सा घर है जिसकी खिड़किया बिलकुल उसी तरह चमक रही है जैसा वो उस पहाड़ी में बसे को घर को अपने घर से देखा करती थी। ये घाटी में दिखाई देने वाला घर उसका की था। वास्तव में ये सूर्य की किरणे थी जो घर की खिड़कियों के शीशे से टकरा कर चमकती दिखाई देती थी। उसे एहसास हुआ की वास्तव में उसका अपना घर जो घाटी में है जहा उसने अपना बचपन गुजरा , माता पिता का प्यार मिला , जिसके आँगन में खेल वो बड़ी हुई और अभी उस घर की खिड़किया सूर्य की रोशनी के कारण चमकती दिखाई दे रही है वह घर सामान्य होने के बावजूद सबसे अच्छा घर है जहां उसे सभी का प्यार और स्नेह मिलता रहा। और फिर वो अपने घर की वापस चल दी और फिर कभी अपने घर को उसने सामान्य और छोटा नहीं समझा।
इस कहानी से हमें यह सिख मिलती है की हम कभी कभार हमारे पास जो है उसकी एहमियत को नहीं समझते और दूसरे की चीज़ो ज्यादा श्रेष्ठा मानने लगते है और फिर जब वो चीज़ हमारे हाथ से चली जाती है तब हमें उसकी महत्ता का एहसास होता है।